भारतीय रेलवे ने रचा इतिहास! अब यूरोपीय लोको जैसी तकनीक भारत के अपने इंजन में, कानपुर शेड की बड़ी उपलब्धि
प्रयागराज। भारतीय रेलवे ने अपने इंजनों को दुनिया की सबसे आधुनिक रेल तकनीक के करीब लाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। कानपुर लोको शेड ने वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता राहुल त्रिपाठी के नेतृत्व में एक ऐसा प्रयोग किया है, जो अब तक सिर्फ यूरोप के सबसे अत्याधुनिक इंजनों तक सीमित था।
क्या हुआ है यह बड़ा कदम?
महाप्रबंधक के निर्देश पर कानपुर लोको शेड की टीम ने एक इलेक्ट्रिक इंजन (लोको नंबर 44061) में एक खास तरह की मशीन लगाई है, जिसे 'डीह्यूमिडिफायर' कहा जाता है, यानी हवा से नमी सोखने वाला यंत्र। इसे आप एक तरह से इंजन के अंदर लगा हुआ 'साइलिका जेल पैकेट' की बड़ी और स्मार्ट वर्जन समझ सकते हैं, जैसा अक्सर नए जूतों के डिब्बे या दवाइयों की बोतल में मिलता है, बस यह उससे कहीं ज्यादा ताकतवर और आधुनिक है।
आखिर नमी से इंजन को क्या नुकसान होता है?
इलेक्ट्रिक इंजन के अंदर एक बेहद अहम हिस्सा होता है जिसे 'ट्रैक्शन कन्वर्टर' कहते हैं, यह वो पुर्जा है जो ओवरहेड तार से मिलने वाली बिजली को इंजन के मोटरों के लिए सही रूप में बदलता है। यह पूरा सिस्टम बेहद संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक सर्किट्स से भरा होता है। अगर इसमें नमी घुस जाए, तो ठीक वैसे ही जैसे गीले मोबाइल चार्जर में शॉर्ट सर्किट का खतरा रहता है, इसके धातु के हिस्सों में जंग लग सकती है, धूल जमने लगती है, और कभी-कभी अचानक स्पार्किंग या खराबी (जिसे तकनीकी भाषा में 'फ्लैश ओवर' कहते हैं) भी हो सकती है। यह सब मिलकर इंजन को बार-बार खराब कर सकते हैं और मरम्मत में समय व पैसा दोनों खर्च होता है।
क्यों है यह उपलब्धि इतनी बड़ी?
अब तक यह तकनीक सिर्फ यूरोप में बनी सीमेंस वेक्ट्रॉन और अल्स्टॉम प्रीमा जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म वाले इंजनों में ही मौजूद थी, जो दुनिया के सबसे आधुनिक और भरोसेमंद इंजनों में गिने जाते हैं। कानपुर लोको शेड की टीम ने राहुल त्रिपाठी के नेतृत्व में इसी विश्वस्तरीय तकनीक को पहली बार भारतीय रेलवे के अपने इंजन में उतारकर यह साबित कर दिया है कि भारतीय इंजीनियरिंग अब यूरोपीय स्तर की तकनीक को अपनाने और उसमें आगे बढ़ने में पूरी तरह सक्षम है।
इससे क्या फायदा होगा?
अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो इसके तीन बड़े फायदे हो सकते हैं:
- कम खराबी: नमी और जंग से बचाव होने पर इंजन के अंदरूनी पुर्जे ज्यादा दिन तक सही हालत में रहेंगे।
- कम रुकावट: इंजन कम बार खराब होगा, यानी मरम्मत के लिए कम बार वर्कशॉप जाना पड़ेगा।
- बेहतर उपलब्धता: इसका सीधा फायदा यह होगा कि ज्यादा इंजन हर समय काम के लिए तैयार (उपलब्ध) रहेंगे, जिससे ट्रेनों के देरी से चलने की समस्या भी कुछ हद तक कम हो सकती है।
आगे क्या?
फिलहाल यह सिर्फ एक इंजन पर परीक्षण के तौर पर लगाया गया है, यानी अभी यह देखा जा रहा है कि यह वाकई कितना असरदार साबित होता है। अगर नतीजे अच्छे रहे, तो आने वाले समय में इसे बाकी इंजनों में भी लगाया जा सकता है, जिससे भारतीय रेलवे का पूरा इंजन बेड़ा लंबे समय में यूरोपीय गुणवत्ता के और करीब पहुंच सकता है।
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